Saturday, December 6, 2008

ग़ज़ल

आओ इस भीड़ में शामिल तुम भी हो जाओ |
मेरी हालत पे दो आँसू तुम भी रो जाओ ||

की जिसके फूल भी चुभते हों, और शाखें भी डरायें |
ऐसे किसी कैक्टस के बीज तुम भी बो जाओ ||

जिसने महरूम कर दिया हमें, नींद से औ' सुकून से |
उसी के नाम की लोरी सुना के कहते हो की सो जाओ ||

मैं गिर गया हूँ ज़मीन पर, मगर अभी मारा नहीं |
मैं उठ के काटने दौडूंगा, झुक कर मेरे करीब न आओ ||

उन्हीं से होती थी सुबह, उन्ही से शाम ढलती थी |
जो वो नहीं हैं आस - पास, तो तुम आओ या कि जाओ ||

Composed on 2nd december 2008

मुंबई में आतंक

कोई घर में घुस के मेरे
माँ का आँचल खींच गया
और हम चौकीदारों से
इस्तीफा लेते रह गए|

रगों में खून ही है अभी
या पिघलकर पानी हो गया ?
की कोई पीटता रहा हमें
और हम वार्ता करते रह गए|

जो सीना ठोकते थे लगाकर आग
वो छिप बैठे बिलों में भागकर अपने
लगी जब आग भारत में
बिहारी - मराठी देखते रह गए|

खुदा का शुक्र है की मर्द थे कुछ
जो कूद पड़े उस आग में;
जो तुम बुड्ढों पे बात आई
तो तुम बयान देते रह गए |

Composed on 29th November 2008