Saturday, November 24, 2012

When Bhabha turned in his grave

At the academy in Mussoorie, a debate has been conducted every year for last 30 odd years in the memory of Homi J Bhabha, the pioneer scientist of India. And as happens with most such memorial debates, it has a running trophy which gets transferred to the winner of each year. The 2012 Homi Bhabha Debate was on "Climate Changed India of 2030's: Heading for Disaster"

I had not taken part in any debate since 2003 or 2004 and felt that I'll never again get to do this school-college type of thing after the real job begins. In the spur of the moment, I gave my name for the debate. On the suggestion of a friend who said that there is a lot of material on the internet denying the existence of climate change, I decided to go against the topic.

But the lazy man that I am, I somehow didn't feel like doing extensive research on the topic and mostly forgot about it till friday. (the debate was to be on monday). Friday, Saturday and Sunday are the days when we get drunk.After getting heavily drunk on Saturday, it occurred to me that I had to write something for the debate. In the most drunken state, I started scribbling something in Hindi. I wrote about 2-3 pages and then dozed off. With a hangover, I woke up on sunday and struggled to read my own handwriting. I then realized I had almost no content or arguement, but the liquor had had a huge impact on the tone of my scribble. Friends suggested that I keep the tone and try including some content. The very friends were also kind enough to google and give me some 2-3 points. I had, by then, thought of a lot of rhetorics. Before the drinks on Sunday, a script was ready. After getting drunk on Sunday, I read out the script to my other drunk friends. They agreed that it had almost no content, but said that if I deliver this with the same vigour that I have when I am drunk, this would be quite an entertainment for the audience.

I had last minute self-doubts. This was, after all, a serious debate, where people would qoute from international conventions and speek in highly bureaucratic English. Would I not be blamed of trivializing and mimicking the entire programme. Somehow my friends were sure that this would be fun. I decided to take the chance. Entertaining the audience became a bigger aim than winning the debate. Here is the script which I delivered....

सन् 1999. मेरी उम्र तकरीबन 16 साल की रही होगी, जब किसी ने ये अफवाह उड़ाई कि दुनिया खतम होने वाली है। मैने न जाने किस-किस भगवान से मन्नत माँगी कि दसवीं की परीक्षा से पहले दुनिया खतम हो जाए। पर भगवान ने मेरी नहीं सुनी। पिछ्ले साल भी एक बार फिर हवा उड़ी कि 2012 में दुनिया खतम हो जाएगी। मैने फिर मन्नतें माँगी कि सिविल सेवा की परीक्षा से पहले ही दुनिया खतम हो जाए। भगवान ने फिर से मेरी नहीं सुनी। 2012 अब भी जारी है, लेकिन ये कमबख्त दुनिया है कि खतम होने का नाम ही नहीं लेती।

अभी मेरे कई काबिल दोस्तों ने Google और Wikipedia से ऐसे-ऐसे तथ्य निकाल कर आपके सामने परोसे कि उन्हें सुनकर आपकी रूह काँप उठी होगी और आप घबरा गए होंगे कि 2030 तक दुनिया का महाविनाश हो जाएगा। काश कि ये सब सच होता और हम इस जालिम दुनिया से निजात पा सकते। पर अफसोस कि ये खामखयाली उतनी ही सच है जितना ये कि माँ के दूध से बच्चे को cancer हो सकता है।

पिछ्ले 20 सालों में, खासकर 1992 के Rio De Jenerio के Earth Summit  के बाद से Climate Change या जलवायु परिवर्तन समाज के बेरोज़गार रईसों के Drawing Room Discussions का एक अहम मुद्दा बन गया है। वैसे ही जैसे कई साल पहले समाजवाद या पूँजीवाद की बहस इनका timepass हुआ  करती थी।

कई महानुभावों का कहना है कि 2030 तक  हमने अपने मौसम को इस कदर बादल डाला होगा कि जीना मुहाल हो जाएगा। मैं इंसान की इस छाती पीटने की आदत का कायल हो गया हूँ। न सिर्फ हम इस बात का दम भरते हैं कि हमने 200 सालों में पृथ्वी की जलवायु बिगाड़ दी है बल्कि इस वायदे  पर भी इतराते हैं कि हम चाहें तो इस जलवायु परिवर्तन को रोक सकते हैं।

IPCC, UNEP एवं कई ऐसी संस्थाओं की मदद से विकसित देशों ने लगभग हमें मना  लिया है कि carbon  dioxide, methane, chloroflourocarbon इत्यादि जैसे गैसों की वजह  से हमारी धरती काफी गर्म हो चुकी है और महाविनाश निकट है। मैं इस बात से इन्कार नहीं करता कि पिछ्ले 200 सालों में मौसम में कोई permanent  बदलाव नहीं हुआ  है। मैं ये भी जानता हूँ कि Greenhouse गैसों का पृथ्वी के तापमान पर क्या असर हुआ  है। पर ये कहना कि ये सब महाविनाश कि निशानी है, ये किसी नौसिखिये कवि की कोरी कल्पना से ज्यादा गम्भीर नहीं लगता।

हम भारतीयों को तब टक किसी बात पर भरोसा नहीं होता जब तक  अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या जेनेवा जैसी जगह से किसी Dr . Robert  या Dr . Carter हमें कुछ Research करके न दिखायें। आपकी इस उत्सुकता को मिटाने के लिए मैं  ऑस्ट्रेलिया के Dr . Robert Carter  के रिसर्च से कुछ बताना चाहूँगा। उनके अनुसार जलवायु हमेशा से बदलता रहा है और बदलता रहेगा। साथ ही CO2 का असर Greenhouse  Effect में सिर्फ 5 से 6% है और 70% असर Water Vapour  यानि  पानी  के भाप का है।

अमेरिका के Jarret Wollstein  बताते हैं कि सन् 1000 एवं 1500 ई. के दौरान पृथ्वी वर्तमान से भी ज्यादा गर्म थी। साथ  ही 1450 ई. से 1850 ई. के बीच भी तापमान गिर गया था और 1940 से 1970 के बीच भी तापमान घटा था। मतलब ये कि इस गर्मी - सर्दी के दौर से इन्सानी हरकतों का तो कोई लेना-देना  ही नहीं है !! NASA की एक report के अनुसार सूर्य में पिछ्ले 100 सालों के Solar Flares सबसे ज्यादा गर्म रहे हैं। मंगल ग्रह पर भी बरफ पिघलती पाई गई है। इससे पहले कि इन्सान मंगल या सूर्य पर पहुँच पाता। Climate Change ने पहले ही जलवे दिखा दिए। Wollstein कि इस रिसर्च ने कितने इन्सानों का दिल तोड़ दिया होगा। इन्सानी ताकत की  ऐसी तौहीन? अफसोस!!

फिर भी मैं मानता हूँ  कि इन्सानों एवं उनकी सरकारों को Climate  Change के नाम पर कुछ न कुछ हाथ - पैर मारते रहना चाहिए। क्या है कि इससे मानव-जाति का आत्म-विश्वास बना रहता है।

भारत जैसे विकास-शील देश में भी National Action Plan for Climate Change के आठ मिशनों की यही कोशिश है। लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि ये मिशन भारत के औद्योगिक विकास को धीमा कर दें।

सिर्फ इसलिए कि विदेशी पर्यटकों को घूमने को हरे-भरे जंगल मिलते रहें, हम उन जंगलों में रहने वाले भारतीयों को सड़क और बिजली से वन्चित नहीं कर सकते। देश केवल पहाड़ों, जंगलों और नदियों से नहीं बनता। वो बनता है उसके लोगों से। क्या झारखण्ड के एक बच्चे को सिर्फ इसलिए Thermal Power की बिजली नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि उसके हिस्से का प्रदूषण कोइ अमेरिकी पहले ही फैला चुका है?

क्या Kyoto Protocol और Clean Development Mechanism  भारत जैसे देशों कि जिम्मेदारी हैं जहाँ 24 घंटों  कि बिजली आज भी एक Luxury है? यूरोप और अमेरिका ने जब चाहा, कोयलों से बिजली निकाली, फिर युरेनियम से और फिर Nuclear Bomb भी बनाया। लेकिन हम पवन-चक्कियों से गाँव को रोशन करें और युरेनियम भी उनसे पूछ  कर इस्तेमाल करें?

डराने वाले यूँ हि डराते  रहेंगे। 2030 में जब शायद मेरी औलाद दसवीं की परीक्षा दे रही होगी तो वे भी भगवान से मन्नत मांगेगी कि दुनिया उसकी परीक्षा से पहले ही खतम हो जाए। लेकिन भगवान ने न उसके बाप कि सुनी थि और न उसकी सुनेगा।

It was clear that the audience enjoyed the delivery of the speech. However, some of them also frowned on what they thought was blasphemic both for the academy as well as for Homi Bhabha. Much to the dissappointment of such people and much more to the sheer pleasure and surprise to us, I was awarded the first prize, thus becoming the Homi J Bhabha Orator of the Year 2012.


All I wanna say is, I am sorry Bhabha :)

5 comments:

Madhuri said...

CMT .. this reminds me of ur n number of superb.. mind blowing speeches of BIV 6A... U are aussom... :):)
keep up the good work senior..so proud of u..

Amit Pandey said...

mast bhokal chapa aapne....really awesome.

Nav Kishlay said...

Jai CMT Baba ki, Uttam ati uttam. waise Bhabha ji bura nahi manange. ye brozgar rayis inhi sab cheezon ka fayda uthate hain aur fir use creativity ya intellect ka naam de dete hain

Dheeraj said...

:) Rocking!!

Rishi.... said...

simply mindblowing and what made yu say yu did not have any content ???