Wednesday, November 27, 2013

महिमा श्री चपरासी जी की

हर दफ्तर में साहब को लगता है कि सब कुछ उनके हुक्म से चल रहा है और बाबू को लगता है कि सब उसकी कलम की महिमा है। लेकिन एक शख्स ऐसा है जिसके होने का सबब आज तक कोई नहीं समझ पाया। हर सरकारी ऑफिस में किसी साहब के चैंबर के बाहर कुर्सी या स्टूल पर या किसी साहब के पीछे फ़ाइल उठाए आपको सफ़ेद या ख़ाकी वर्दी पहने यह शख्स नज़र आ जाएगा जिसे चपरासी या peon कहते हैं।

ये समझना असाना नहीं है की चपरासी जी करते क्या हैं। ये अँग्रेजी सरकार के भारतीय ज़मीन पर किए जाने वाले अनेक अचंभित कर देने वाले आविष्कारों में से एक है। 'साहब' तो अंग्रेज़ खुद थे, सो उन्होने दो नई जातियों के आविष्कार किए। एक तो 'बाबू' जिसकी जितनी बातें की जाएँ कम हैं, और दूसरा 'चपरासी'। चपरासी का कोई work plan नहीं होता, उसके कोई targets भी नहीं होते। लेकिन फिर भी चपरासी सरकारी तंत्र का एक अभिन्न अंग है। 

अक्सर साहब के चैंबर के बाहर बैठा चपरासी सबसे उच्च कोटि का  चपरासी होता है। एक तो उसके पास बैठने को अपनी कुर्सी होती है और इस मामले में वो साहब और बाबू के समतुल्य होता है। दूसरे ये कि साहब के चैंबर में प्रवेश का एकाधिकार सिर्फ उसके पास होता है। वो चाहे तो आपको एक मिनट में साहब से मिलवा दे या फिर वो अपनी पे उतार आए तो किसी मायावी मीटिंग में साहब को इतना busy बता दे की आप कभी साहब से मिल ही न पाएँ। ऐसे चपरासियों के नाम नहीं होते। पहले गोरे साहब इन्हें "कोई है?" के नाम से बुलाते थे और अब भूरे साहब अपनी table पर लगी घंटी बजा कर बुलाते हैं। घंटी बजाने वाले साहब को अक्सर ये नहीं पता होता की घंटी सुनने वाला चपरासी कहाँ से अचानक प्रकट हो जाता है। और साहब के आदेश के पालन के बाद फिर से अंतर्ध्यान हो जाता है। परंतु उच्च कोटि का चपरासी होना किसी चपरासी के लिए केवल गर्व का नहीं बल्कि चिंता की भी विषय होता है। जीतने बड़े साहब का चपरासी उतना ही ज़्यादा काम। 

जो छोटे साहब लोगों के चपरासी होते हैं, उनमें भी एक अलग attitude होता है जो न सिर्फ आने वाली आम जनता पर दिखता है बल्कि साहब को भी उस attitude का शिकार होना पड़ता है। कई बार घंटी बजाने के बाद भी जब चपरासी नहीं आता तो साहब को मजबूरी में आकर खुद ही पानी लेकर पीना पड़ता है और इससे ज़्यादा अपमानजनक बात किसी भी सरकारी साहब के लिए कुछ और नहीं हो सकती की उन्हें पानी भी खुद ही लेकर पीना पड़ता है। 

चपरासियों की भी कई श्रेणियाँ होती हैं। कुछ जो दफ्तर के बड़े साहब के साथ लगे होते हैं उनके कपड़े बर्फ की तरह उजले और कंधे पर किसी सौन्दर्य प्रतियोगिता की विजेता की तरह के sash भी होता है, और कभी कभी एक ऊंची पगड़ी भी। लेकिन जो मध्यम दर्जे के साहब का चपरासी होता है, वो साल में केवल एक बार अपनी वर्दी धुलवाता है, और जिस चपरासी की duty किसी बाबू के साथ होती है, वो अपने को सदैव छुट्टी पर ही मानता है और वर्दी तभी पहनता है जब उसका mood होता है। 

मुझ जैसे नौसिखिए जो अपनी पानी की बोतल खुद लेकर आते हैं और जो चाय भी नहीं पीते, जो अपने चैंबर का दरवाजा खुद खोल्न और बंद करना जानते हैं और जिन्हें फ़ाइल उठाने में भी कोई तकलीफ नहीं होती, उन्हें चपरासी बड़ी हिकारत और नफरत भरी निगाहों से देखते हैं। उनमें ऐसी कानाफूसी होती रहती है कि ये भी भला कोई साहब हैं जो खुद स्कूल के बच्चे की तरह पानी की बोतल लेकर दफ्तर आते हैं। साहब तो एओ फलां-फलां साहब थे जिनके आने से पहले चपरासी दरवाजा खोले, कमरे की बत्ती और पंखा चलाये कुर्सी खींचने के लिए तैनात रहते थे। उन साहब के पीने का पानी चपरासी गिलास में डालकर उसपर ढक्कन भी रख दिया करते और पानी पीते ही तुरंत refill करने के लिए दौड़ पड़ते। एक और चपरासी तो उनके साथ गाड़ी में सिर्फ दरवाजा खोलने और पानी पिलाने के लिए ही बैठता था। वो ठाठ भी क्या ठाठ थे। ये तो गरीब साहब हैं। खुद ही अपना बैग उठाते हैं और खुद ही अपनी फ़ाइल एक कमरे से दूसरे में लेकर चले जाते हैं। 

ऐसे नौसिखिये साहब लोगों की वजह से चपरासियों की कीमत कम हो जाती है। क्योंकि अगर हर साहब अपनी गाड़ी का दरवाजा भी खोलने लगें और अपने चैंबर का दरवाजा भी; अगर वो खुद ही बत्ती जला भी लें और बुझा भी लें और पानी भी खुद ही लेकर पी लें तो कैसे चलेगा भला? और तो और अगर साहब लोग बिना चपरासी के पर्ची लाये सबसे मिलने लगे तो चपरासी की power ही क्या रह जाएगी। ऐसे साहब खतरा हैं चपरासी समाज के लिए और इनका विरोध करना चाहिए। 

Sunday, September 15, 2013

मत मारो मेरी हिन्दी को

कल हिन्दी दिवस थी। एक बार फिर लोगों ने कसम खाई की हिन्दी को और बढ़ावा देने की पूरी कोशिश करेंगे। एक बार फिर हिन्दी के ठेकेदारों ने इंग्लिश और उर्दू के खिलाफ जहर उगला और कोशिश की कि हिन्दी को और भी संस्कृत जैसा बना दें। और एक बार एक आम हिन्दी बोलने वाला नाराज़ होने से ज़्यादा कुछ न कर पाया। 

14 सितम्बर को हिन्दी दिवस इसलिए नहीं मनाते कि इस दिन कोई बहुत बड़ा कवि या लेखक पैदा हुआ था। हम इस दिन हिन्दी दिवस इसलिए मनाते हैं क्योंकि देश के संविधान सभा ने इसी दिन हिन्दी को आज़ाद भारत कि शासकीय भाषा मान लिया था। ये उतना ही दबंग कदम था जितना कि यूरोप का किसी एक भाषा को अपना लेना। इससे पहले भी शासकीय भाषा के रूप में फारसी और अंग्रेज़ी भारत पर थोपी गयी थी लेकिन वो वक़्त और था। अब ये हमारा अपना देश है और इसलिए लोगों से सोचा कि जैसे ये देश कभी मुग़लों के अधीन था और कभी अंग्रेजों के तो क्यों न अब इसे हिन्दी के अधीन कर दिया जाये।
कहीं न कहीं वे लोग हिन्दी को समझने में चूक कर गए। हिन्दी संस्कृत नहीं है। हिन्दी फारसी या अंग्रेज़ी की दुश्मन भी नहीं है। ये तो लोगों कि बोली है। शायद आज़ादी आने कि इतनी खुशी थी या पाकिस्तान के अलग हो जाने का इतना गुस्सा कि हमने सोचा कि हम अपनी भाषा ऐसी बनाएँगे जो सबसे अलग हो और इस सब में ये ही भूल गए कि भाषा जनता से बनती है सरकार की तरफ से थोपी नहीं जा सकती। 

जब तक भारत पर मुग़ल राज स्थापित नहीं हुआ था, तब तक शायद कोई एक ऐसी भाषा नहीं थी जो पूरे भारत को एक सूत्र में बांधती हो। हम भी शायद आज के यूरोप जैसे थे। कहने को संस्कृत तो थी लेकिन उसे ब्राह्मणों ने अपनी बपौती बना कर उसका दम घोंट दिया था। दक्षिण भारत में तमिल, मलयालम, तेलुगू और कन्नड़ अपने आप में इतनी शानदार भाषाएँ थी कि उन्हे बदलना आसान नहीं था। न सिर्फ वे साहित्य और संगीत की भाषा थे बल्कि वे जनता की भी भाषाएँ थी। और शायद इसलिए आज भी ये भाषाएँ उसी दम खम से टिकी हैं जिस शान से वे हजारों साल पहले थी। लेकिन उत्तर भारत में हालात और थे। यहाँ ब्राह्मणों ने संस्कृत का ये हाल कर डाला था की जनता की अपनी हजारों बोलियाँ पनप चुकी थी। पाली और प्राकृत से निकली मारवाड़ी, मेवाती, अवधी, मैथिली, बुन्देली, ब्रज, पहाड़ी सब अपने आप में एक अलग संस्कृति और उसके लोगों के जीवन की कहानियाँ सुनाती थी।

जब दिल्ली में मुस्लिम राज आया तो फारसी सरकारी भाषा हो गयी और सारे कागजी काम फारसी में होने लगे। लेकिन इसका भी जल्दी ही संस्कृत वाला ही हश्र होना था। मुग़ल सेना के सिपाहियों ने अपनी बोलियों और फारसी के शब्दों से एक नयी भाषा का ईजाद किया जो उर्दू कहलाने लगी। जैसे संकृत के ब्राह्मणों ने कभी देशी बोलियों को तवज्जो नहीं दी उसी तरह फारसी और अरबी के शायरों ने उर्दू की भी अवहेलना की। करीब 1800 ईस्वी के बाद उर्दू ने थोड़ी इज्ज़त पाना शुरू की।  ग़ालिब ने अपनी उर्दू से ज़ौक़ की फारसी ले लड़ाई जारी रखी। इसके 300 साल पहले तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखी थी जो अवधी में थी। दक्षिण भारत में भी जहां तक मुग़ल पहुंचे वहाँ नयी तरह की भाषाओं का आविष्कार हुआ। और हैदराबाद के आस पास दक्खिनी हिन्दी पनपने लगी। धीरे धीरे उर्दू में देसी शब्दों का इस्तेमाल बढ़ता गया और 1900 तक ये बता पाना मुश्किल हो गया की उर्दू कितनी फारसी है और कितनी हिंदुस्तानी। अंग्रेजों का राज तब तक पूरी तरह से कायम हो चुका था और अंग्रेज़ी नयी सरकारी भाषा थी। लेकिन अंग्रेजों ने जमीनी दस्तावेज़ों को पुराने तरीके से चलते रहने दिया। 

ऐसे में उर्दू जनता की भाषा बनने लगी, लेकिन कुछ 'फारसी ब्राह्मणों' को उर्दू के देसीकरण को रोकने की कोशिश की और तब हिन्दी का जन्म हुआ। इसमें उर्दू के भी शब्द थे, और देसी भाषाओं के और भी ज़्यादा शब्द थे।  मल्लिक मोहम्मद जायसी पहले ही ऐसी हिन्दी में लिख चुके थे। भारतेन्दु हरिश्चंद्र भी अब इस हिन्दी में लिखने लगे। और इसे हिंदुस्तानी भाषा कहा जाने लगा। ये कोई एक भाषा नहीं थी। इसकी कई बोलियाँ थी। दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खड़ी बोली पनपने लगी और राजस्थान की मारवाड़ी से कांगड़ा की पहाड़ी तक और बिहार की मैथिली से हैदराबाद की दक्खिनी तक और भोपाली से लेकर मुंबइया तक हिन्दी के कई प्रकार बन गए। और यही वजह थी की हिन्दी लोगों की बोली बन गयी। क्योंकि हिन्दी किसी सरकार की तरफ से नहीं बल्कि लोगों की मर्ज़ी के हिसाब से बदलती रही।

जब भारत में सिनेमा की शुरुवात हुई तो कई उर्दू के ऐसे लेखक जो उर्दू के संस्कृत जैसी होती हालत से दुखी थी, वे सिनेमा की तरफ आए। कई बंगाली लेखक और मराठी लेखकों ने भी सिनेमा की हिन्दी को नए आयाम दिये। और अंग्रेज़ी को भी अपनाने में हिन्दी ने कोई हिचकिचाहट कभी नहीं दिखाई। अब बैंग्लोर में भी एक नयी तरह की हिन्दी का ईजाद हो रहा है जो लोगों की बोली है। 

लेकिन इस सब के बीच हमने हिन्दी को सरकारी भाषा अर्थात राजभाषा बनाकर एक अजीब सी गलती कर डाली। एक भाषा जो अभी सौ साल पुरानी भी नहीं थी और अपने नए जन्म में खुशी से इठला रही थी, हमने उसे किशोरावस्था में ही सरकार के हाथ गिरवी रख दी। और हिन्दी पर संस्कृत थोप दी गयी। हमने ये नहीं सोचा कि अगर संस्कृत जनता कि भाषा होती तो वो भी तमिल की तरह आज भी ज़िंदा होती। लेकिन हिन्दी पर संस्कृत थोप कर हमने उसे उर्दू और अंग्रेज़ी के खिलाफ एक जंग में खड़ा कर दिया। और तो और हमने हिन्दी को हिन्दी की ही बोलियों के खिलाफ खड़ा कर दिया।

इसलिए सरकारी हिन्दी में रिपोर्ट (अंग्रेज़ी) को प्रतिवेदन (संस्कृत) कर दिया, दारोगा (उर्दू)/इंस्पेक्टर (अँग्रेजी)  को निरीक्षक (संस्कृत), किसान (देसी)/ काश्तकार (उर्दू) को कृषक (संस्कृत) कर दिया। और तो और हमने "शुद्ध हिन्दी" नाम का एक ऐसा दानव बनाया जिसने हिन्दी को पूरी तरह खिलने से पहले ही मारने का प्लान बना दिया। हिन्दी कि खूबसूरती इसमें है कि खूबसूरती को सौन्दर्य कहना ज़रूरी नहीं है और न ही ज़रूरत को आवश्यकता कहना आवश्यक है। दूध को दुग्ध कहना और कंप्यूटर को संगणक कहना बेवकूफी है। हिन्दी बीसवीं सदी की भाषा है। हम क्यों इसे वक़्त में पीछे धकेलना चाहते हैं? अगर इसे इक्कीसवी सदी में अपना वजूद बनाए रखना है तो इसे अंग्रेज़ी और उर्दू की दुश्मन बन कर नहीं बल्कि उर्दू, अंग्रेज़ी और सभी देशी भाषाओं की दोस्त बन कर रहना पड़ेगा।

दक्षिण भारत में भी हिन्दी तभी फैलेगी जब ये तमिल से दुश्मनी करने की बजाय उसे अपनाएगी। संस्कृत को बचाए रखने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन उसके लिए हम एक नयी भाषा को अपने नैचुरल तरीके से पनपने से न रोकें। अगर इस हिन्दी दिवस को कोई संकल्प लेना ही है तो ये संकल्प लें कि हिन्दी को लोगों की भाषा बनने दें और जैसा भी लोग चाहें वैसा रूप हिन्दी को लेने दें। चाहे वो बॉलीवुड से आए, इंटरनेट से या फिर हिन्दी की किताबों से। हिन्दी पर किसी भी प्राचीन भाषा से दंगल का भार न डालें। फिर शायद हमारे पास ऐसी एक सरकारी भाषा होगी जो सचमुच पूरे भारत को अपना सके।  

Tuesday, August 13, 2013

Scared of an F

The weather was very cold that morning. Kanpur is so cold in winters and the IIT is always colder than the city. The answer sheets for the 5th sememster were to be shown that day. Mechanical Engineering had been proving very difficult for me, especially the 3rd year. I was always worried about the academics and I could see the grades slipping by. I knew that I had spent most of the semester in watching movies on my newly bought desktop or writing new poems in Hindi. I had also spent a lot of time editing the college magazine and zillion other such things that took my time away from academics.

Theory of Machines was a very critical course for Mechanical Engineers. It must have been something to do with machines, but I didn't understand much of it. The course was taught by Dr. A. K. Mallik. Only few months ago, on the occasion of Teacher's day he was awarded the Best Teacher. As luck would have it, I was then the Acting Convener of the Students's Senate, and thus I was party to the meeting in which the Best Teacher was decided. I personally respected Dr. Mallik a lot. He was one of the most learned and distinguished teachers at IIT Kanpur. But that did not help me understand the Theory of Machines. I still struggled to understand how does a cam or a gear box work.

In the end sems, the exam was for 130 marks and as far as possible, I had attempted all questions. But I was scared on the day when answer sheets were to be shown. We were called to the TA lab where we were handed over our answer sheets. In most of the answers I had got 1 or 2 marks and the total was 13 out of 130. Within minutes I knew that I had the second lowest marks in a batch of 70 students. In IITK, there was no passing marks as such and it was left to the Prof to decide on what marks would he pass a student. 10% was not a score on which I could be hopeful. It was one of my lowest scores ever. And if Prof Mallik decided to fail even two students, I would get an F. I tried approaching Dr. Mallik and ask on what marks would he pass us. He said that it could not be disclosed. Only when the list of students who have been awarded F is pasted outside the DOAA office would I know whether I had passed the course or got an F.

I came back to my room and was sitting scared. Back home in Bokaro, parents were busy preparing for my brother's marriage to be held in two weeks. I did not have the courage to call up home and tell them what had happened. I was reminded of how I was the topper of my class in school for six years. But I had performed miserably in Mechanical Engineering. Was I actually an idiot? Did I not have even the average intelligence to understand Mechanics? Various thoughts kept coming to my mind and I felt like crying, but I couldn't. I was petrified to think what would my parents think when I would fail. Our entire extended family would be there at my brother's wedding and everyone would laugh at me and my parents. I went up to the roof of the Hostel and kept thinking of jumping off it. But couldn't sum up the courage. I should jump, I thought. But I just couldn't. My friends had advised me to go and meet Dr. Mallik in his office. I decided to give it one more try.

I went up to Dr. Mallik's chamber next day but he did not recognize me. I told him that I was in the Theory of Machines course and had got the second lowest score in the endsems. I asked him again if I would get a F in the course or will pass it. He politely declined to divulge anything about it. I was adamant. I told him a lot of things. How my brother is getting married in two weeks and how my parents have high hopes of me and how I have always been a good student and how I would work hard from the next semester. But Dr. Mallik smiled and asked me, "Chandra Mohan, why are you so scared of failing in this exam? What would go wrong if you got an F?"

I was shattered. I thought that he had already failed me and hence was trying to convince me to accept the grade. I persisted and said that I cannot accept an F and that last evening I had contemplated jumping from the roof of my hostel. To my surprise, he was not perturbed. My eyes were already wet and I could not believe that even the threat of suicide couldn't convince him to pass me. He was more consistent than me. He asked me again, "Why are you so scared of failing?"

He continued, "Today it does appear to you that you want to pass this course any which way. But think about me, I feel like a failure that I could not teach you well enough so that you could do well in this exam. If it was because you didn't come to classes, then too it was my fault that I could not generate enough interest in you for this subject. Chandra Mohan, I have been teaching for a very long time and I always feel bad when I have to fail a student. But let me tell you, I would fail a student only if there is no other choice left. And I feel bad that you are so worried about getting an F in a course. Trust me, ten years from now, you will think about today and feel ashamed of yourself that you were begging and crying in front of me to pass a course. Life is very long son, and a grade here and there does not make or break your life. Do not think of jumping off a roof just because you failed an exam. And don't worry about what people would call you. If deep inside you know that you are a good man, you will have a good life. Go home, and enjoy your brother's wedding and do not worry too much about this grade. You will know it when the list is out. All the best. You may go now." I left his office and was very confused as to what he had said. It did not make sense to me. All I understood of the the conversation was that he must have failed me and is just being too idealistic about not telling it to me now. Next day, I caught the train and reached home. 

A week later, Piyush called from IITK and told me that the list of F's was out and my name was not there in the list. I had passed the course with a D grade. I was too happy to have saved the embarrassment. I do not remember anything about the Theory of Machines but those words of Dr. Mallik are still quite clear in my head and roughly eight and half years later, I think about that day and feel glad that did not jump off the roof.


Thursday, July 25, 2013

साब! कुछ चाय पानी ?

मैं चाय नहीं पीता। और ये मेरी सबसे बड़ी मुसीबत है। ऐसा नहीं है कि मुझे चाय पसंद नहीं है। मुझे हर मीठी चीज़ पसंद आती है। लेकिन चाय मुझे कुछ खास नहीं भाती। न तो उसे पी कर मुझे कोई ऊर्जा मिलती है और न उससे मेरी थकान भागती है। हाँ! अगर ठंड बहुत हो तो एक गरम चाय का कप मैं इंकार नहीं करता। फिर भी चाय मेरे लिए सिर्फ एक गरम पेय से ज़्यादा नहीं है और उसकी जगह अगर गरम दूध भी मिल जाए तो भी काम चल जाए। 

लेकिन अफसोस ये है कि मेरे आस पास बाकी लोग बहुत चाय पीते हैं। और चाय भी सबको अपने-अपने प्रकार की चाहिए। अगर आप चाहें तो लोगों की पसंद की चाय के आधार पर उनकी पर्सनलिटी का पता लगा सकते हैं। मेरे पापा और भैया काफी मीठी चाय पीते हैं और दोनों ही ज़िंदगी को लेकर कभी कोई खास टेंशन नहीं लेते जबकि मेरी बहन और पत्नी कम चीनी और तेज़ पत्ती की चाय पीती हैं और दोनों है भी काफी तेज़। कुछ लोगों को कुल्हड़ की चाय में स्वाद आता है और कुछ लोगों को फाइव स्टार होटलों में मिलने वाली 'दूध-अलग-चीनी-अलग' वाली चाय में। गरीब आदमी शरीर की थकावट मिटाने को चाय पीता है और अमीर मन को आराम पहुंचाने के लिए। ज़्यादातर लोगों को चाय की ऐसी तलब होती है कि सुबह उठते ही बिस्तर पर बेड-टी चाहिए। कुछ लोगों को खाने के तुरंत बाद चाय पसंद है और कुछ को ऑफिस से घर आते ही।

लेकिन भाई साहब मैं उन अभागों में से हूँ जो चाय के शौकीन नहीं। पर चाय का शौकीन न होना  इतना आसान भी नहीं है। ये कोई हिन्दु धर्म जैसा थोड़े ही है कि मंदिर जाओ न जाओ रहोगे तो हिन्दू ही। ये तो जी आजकल की राजनीति के हिन्दुत्व जैसा है, या तो आप चाय के शौकीन और पक्षधर हैं या फिर चाय के दुश्मन। और ऐसे माहौल में चाय से दुश्मनी लेना कोई छोटी मोटी बात नहीं।

जब तक मैं स्कूल में था तो न कोई उम्मीद करता था कि मैं चाय पीऊँ और न ही कोई पूछता ही था। लेकिन जब कॉलेज पहुंचा तो देखा कि दोस्तों के साथ वक़्त बिताने के लिए चाय पीना बड़ा ज़रूरी है। हम सब दोस्त हॉल 3 की कैंटीन में चाय और समोसे के लिए अक्सर जाया करते। जब दोस्त चाय पीते तो मैं समोसे खा लेता और अक्सर बिना चाय पीए ही लौट आता। हम अक्सर सुबह सुबह एम टी जाते चाय पीने एक लंबे नाइट आउट के बाद। लेकिन मैं वहाँ भी एम टी के पकौड़े और जलेबी दही के लालच में ही जाता था। चाय तो तभी पी पाता था जब बहुत ठंड होती थी। जब कॉलेज से घर जाता छुट्टियों में तो मम्मी पूछती की चाय पीनी शुरू की या नहीं और हर बार ये सुन कर खुश हो जातीं की उनका लाल अब भी चाय की लत से दूर है।

कॉलेज के बाद जब सेल्स की नौकरी लगी तो लाइफ इतनी आसान नहीं रह गयी। मुझे एरिया सेल्स मैनेजर के रूप में काफी बड़ा एरिया मिला जिसमें पंजाब भी शामिल था। पंजाब के लोग खाने पीने के शौकीन हैं इसमें बताने जैसी कोई बात नहीं है। खाने का तो मैं भी शौकीन था ही। सो मैंने सोचा कि खूब जमेगी पंजाब में अपनी। हर दुकान पर जाते ही दुकान वाला चाय के लिए पूछता और मैं मुस्करा कर मना कर देता कि मैं चाय नहीं पीता। कुछ तो इस बात से दुखी हो जाते लेकिन कुछ और बदले में लस्सी या छाछ या लेमन सोडा ऑफर कर देते। एक महीने के बाद मेरे एक सेल्स ऑफिसर ने कहा, "बॉस, मार्केट में लोग आपसे कुछ खुश नहीं हैं और ये अफवाह उड़ रही है कि नए मैनेजर कुछ ज़्यादा ही अक्खड़ और नखरे वाले हैं।" मैं चकरा गया। जब मैंने इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि लोग कहते हैं कि ये मैनेजर तो हमारे यहाँ कि चाय तक नहीं पीता। मेरी उस दिन समझ में आया कि चाय कितनी ज़रूरी है इंसानी रिश्तों के लिए। चाहे आप इसे सेल्स का प्रैशर कहें या मेरी इंसानियत, मैंने चाय के ऑफर पर हाँ कहना शुरू कर दिया।

फिर क्या था। मैं एक दिन में करीब दस से पंद्रह दुकानों में जाता था और हर दुकानदार मुझे चाय पीने को कहता। मैं हाँ कह देता और शाम तक दस पंद्रह कप चाय पीकर मेरी हालत खस्ता हो जाती। लेकिन इन चाय के प्यालों ने मुझे पंजाब के उन दूकानदारों से ऐसी दोस्ती करवा दी कि फिर चाय सिर्फ चाय न रह गयी। कभी कोई गोल्डेन टैम्पल के पास वाले कुल्चे खिलाता तो कोई जलंधर की हवेली की पूरी सब्ज़ी और कोई पठानकोट के दाल के पकोड़े। मैं भी चाय के साथ मिलने वाली ऐसी ललचाने वाली चीजों के चक्कर में चाय पीता चला गया और जैसे तैसे अपने सेल्स के तीन चार साल पंजाब के चाय को झेलते बिता दी। और फिर मुझे जोश चढ़ा पढ़ाई करने का और मैं नौकरी छोड़ कर दिल्ली के राजेंद्र नगर में आ गया।

यहाँ आई ए एस की तैयारी करने वालों में चाय कि तलब मुझे पंजाब के दूकानदारों से भी ज़्यादा दिखी। मेरे जो भी दोस्त बने वो अनिल की चाय की दुकान पर ही बने और हर शाम को वहाँ ऐसी ऐसी गंभीर चर्चा होती कि लगता देश अब सुधरा कि तब सुधरा। मुझे यहाँ भी चाय से ज़्यादा अनिल की दुकान पर मिलने वाली वो ब्रैड कि रस्क ज़्यादा पसंद आती। रस्क को गरम चाय में डुबोकर नर्म मीठी रस्क खाने में बड़ा मज़ा आता। और ऐसे ही चाय का दौर चलता रहा। और अब जबकि मैं सरकारी नौकरी में अपने पैर जमा रहा हूँ तो चाय से पीछा छुड़ाना मुश्किल हो गया है। इतने सालों तक चाय पीने के बावजूद मैं अब तक चाय का अमली नहीं हुआ हूँ और ये मेरे चाय के शौकीन दोस्तों को अभी भी चकित कर देता है।

सरकार में रहकर आपको ऐसा लगेगा कि ये देश अब भी वैसे चल रहा है जैसे अंग्रेज़ इसे चलाते थे। ब्यूरोक्रेसी और आर्मी दो ऐसी संस्थाएं हैं जो आज भी लगभग वैसी ही हैं जैसा अंग्रेजों ने जाते जाते इन्हे छोड़ा था। और आइस वाली व्हिस्की के अलावा एक चीज़ जो अंग्रेजों ने इन दो संस्थाओं में अपनी छाप कि तरह छोड़ी है तो वो है चाय। सरकार में चाय सिर्फ एक पेय नहीं है। ये एक सरकारी बाबू कि दिनचर्या का एक अभिन्न अंग है।

सुबह जब काफी देर से ऑफिस की शुरुआत होती है तो एक ही घंटे में चाय के ब्रेक का वक़्त हो जाता है। यहाँ भी कर्मचारी की चाय और अफसर की चाय में फर्क होता है। ऑफिस का चपरासी एक शीशे के गिलास में चाय पीता है लेकिन जब साहब की चाय लेकर आता है तो चाय का कप एक छोटी सी प्लेट में रखा होता है। और चाय के साथ कम से कम दो तीन तरह के बिसकुट ज़रूर होते हैं। सो मुझे इन्हीं बिस्किट्स का इंतज़ार रहता है। पर उससे भी शानदार चाय होती है शाम की चाय और वो भी तब जब कोई बहुत ही सीनियर अफसर या मंत्री आपको शाम की चाय पर बुलाये।

क्योंकि हम अभी ट्रेनिंग पर हैं तो हमें रोज़ ही किसी न किसी बड़े अफसर या मंत्री से मिलने जाना होता है कर्ट्सी विसिट के नाम पर। और जब ऐसी जगहों पर चाय मिलती है तो उसे सिर्फ 'टी' नहीं कहते, उसे कहते हैं 'हाई-टी'। अब उसे 'हाई' क्यूँ कहते हैं ये तो मैं नहीं जानता लेकिन ये ज़रूर समझ गया हूँ कि हाई टी में चाय सिर्फ एक साइड एक्टर बनकर रह जाती है। चाय के साथ कम से तीन चार तरह के पकोड़े, समोसे, ढोकला, चिप्स, पेस्ट्री, मिठाई, और न जाने क्या क्या ऑफर किया जाता है। और इसलिए हाई टी मेरी फेवेरेट चाय बन गयी है। आज कल जब भी ऐसी किसी उच्च स्तरीय बैठक में हमें बुलाया जाता है तो मैं यही देख कर अपने मेजबान की सीनियरीटी का अंदाज़ा लगाता हूँ कि आखिर हाई टी कितनी हाई थी। एक मंत्री जी के यहाँ चाय के साथ इतने पकवान थे कि मैं चाय तक पहुँच ही नहीं पाया और मेरे मन में उनके प्रति काफी सम्मान उमड़ पड़ा। एक सीनियर अफसर ने चाय के साथ सिर्फ बिसकुट दी वो भी केवल नमकीन वाली तो मैं समझ गया कि ये या तो बेहद ईमानदार हैं या बेहद कंजूस। जब एक हाई टी में पास्ता और छोटे छोटे पिज्जा भी दिखे तो मेरे मन से भूरि भूरि प्रशंसा निकली उन साहब के लिए।

हाल ही में ससुराल के एक रिश्तेदार ने चाय पर सपत्नी बुलाया और मैं स-ससुराल ही पहुँच गया। ससुराल वाली चाय की अलग ही बात होती है। दामाद की इज्ज़त भी किसी सरकारी अफसर से कम नहीं होती। कभी कचौरी, कभी पोहे तो कभी टिक्की, चाय अकेले कभी नहीं आती। और जब चाय का न्योता ससुराल के किसी रिश्तेदार से आया हो तो पता होता है कि यहाँ न सिर्फ चाय के साथ दमदार नाश्ता मिलेगा बल्कि पैर छूते छूते दो तीन कडक नोट वाले लिफाफे भी आ जाएंगे जेब में। बाद में ये लिफ़ाफ पिज्जा खरीदने के काम आते हैं। इस बार वाले नाश्ते में भी जम कर टिक्की, पनीर पकोड़ा, ढोकला और चाट का लुत्फ लिया गया। आखिर पंजाबी ससुराल होने का असली फायदा तो खाने पीने वाला बिहारी पंडित ही उठा सकता है।

लेकिन आज तब हद हो गयी जब चाय की ब्रेक में सरकारी चाय के साथ न कोई समोसे मिले और न ही कोई बिस्कुट। पिछले कुछ दिनों से मिल रहे नयी तरह के कूकीस पर दिल आ गया था मेरा तो। लेकिन आज बस फक्त चाय!! आज मुझे चाय इतनी गरम लगी कि मुझे एहसास हुआ कि मौसम कितना गरम हो गया है। ऐसे मौसम में भी कोई चाय पी सकता है भला? एक बार फिर मेरा पलड़ा 'चाय के शौकीन' से 'चाय के दुश्मन' की तरफ बदल गया है। कल एक मंत्री जी के घर फिर से चाय का न्योता आया है। देखते हैं कल टी कितनी हाई होती है। तभी पता चलेगा कि मैं चाय का फिर से शौकीन बन पाता हूँ या नहीं। 

Monday, July 8, 2013

The 'laddoo' of Failure

It was a dull morning of June 2001. Weeks ago, I had got my XIIth boards results securing 89.6% marks. I was planning in my head to go to the Delhi University and follow my dream to study Hindi literature in graduation. My friend Abhimanyu was going to follow his dream and was confident that he would get admissions in SRCC in commerce or economics. I appreciated his rebel attitude. I was thinking between St. Stephens Chemistry and Hindi Literature at Hindu or KMC. Papa had gone to Plant (Bokaro Steel Plant) in the 'A' shift that begins at 6 am and he would be back only at 2 pm. I had celebrated my 18th birthday months ago in January and had also appeared at the IIT-JEE mains in May under the compulsion of my parents. 

In the prelims of JEE, I had secured a rank around 15000, when roughly 16000 students had qualified. I had no inclination to go to the IIT as science did not interest me. I studied for my Boards and as a sign of rebellion, did not study for the JEE Mains. I was determined to revolt against Papa and go to Delhi for my graduation. At 8 am, the results were about to come. I somehow knew that I wouldn't make it and then I shall be off to Delhi. Papa shall have to agree.

There was no internet cafe nearby, but Nidhi had internet at her home. She always thought that I was a bright student and would get through IIT for sure. She had kept my roll no. to check the results. At around 8:15am, Nidhi called on our landline phone. I picked up. She was very sad and found it tough to tell me that I haven't qualified the JEE Mains. The rank is somewhere in the 8000 whereas there were only 3000 seats. She said she had checked the result several times. She re-confirmed my roll no. She said I should go and check the results myself. May be there has been a mistake. I was surprised to see her so concerned. I was cool. I knew I would not make it. I did not want to. I am a rebel, I told her and I shall do what I want to do. She was going to pursue Commerce in Pune so I expected her to understand.

I told Mummy and Gudia that the results are out and I haven't made it to IIT. Gudia was not as shocked as Mummy. She appreciated my rebellion but somewhere found me rude for not working towards IIT, just to prove a point to Papa. Mummy was in tears immediately. I tried to argue with her. "Why don't you understand? I do not want to become an engineer. I want to be a poet and pursue Hindi in Delhi." She looked at me with shock. She took me to the Dining room and opened a door. Behind the door, on the nails, hung a packet of sweets. She told me, "Your Papa bought these last evening and hid them here." He had told her while going to the Plant that the results will be out at 8 am. "I shall be in Plant then. Serve the sweets when IIT results are out." He was sure that I will get into IITs.

Papa had all his faith in me. I was rebelling against him, but he wasn't against me. I was fighting a one sided war, where the other party wasn't fighting at all. He was hyper-confident about my brilliance and thought that I was bluffing about not liking science. My victory soon turned into a defeat. My mother was crying. Seeing her, Gudia also started crying. I was confused. I thought I had my chance to go to Delhi to pursue my own interests. But that box of sweets was staring in my face. That man trusted me and I broke his trust. I did not fail because I could not study. I failed because I did not study. I was cheating him when I kept buying books and study material and kept dumping them. How would I face him now? What would he do with these sweets? He shall be heart broken. I was reminded how he had a heart attack only less than two years ago.  I was scared. My feet started trembling. And tears rolled down my eyes.

I went to Mummy's bedroom and cried for hours in front of the Gods. She cried alongside me. The more she cried, the more I realized how much did it matter to them that I get into IIT. I was the first child in our family who had shown signs of good academics and people thought highly of me. Papa was taunted by engineers in the plant that how can a Fitter dare to dream of his son becoming an engineer. He had kept his calm patiently waiting for the day when he would answer back to his bosses that his son did become an engineer. I did not know all this. The more I knew, the more I was filled with guilt. 

No one had lunch. Gudia and Mummy kept sulking somewhere and I kept lying on the floor, dreaded with the fear of facing Papa when he returns home. The door bell rang at around 2:30 pm. Mummy opened the door and I could hear Papa asking, "What is the rank?" The man would not be ready to accept that I had failed. Mummy told him that I failed to make it to the list and tears again rolled out of her eyes. Papa asked where I was. She told him that I was not ready to face him. He called me out. I sheepishly came out and stood with my head hung in shame. My eyes were red with and tears were still trickling.

Papa had not seen me crying in years. No one had. I had not cried even when Papa was in the ICU after the heart attack. He did not like the fact that I was crying. He asked me to sit and asked, "Why do you think you did not qualify?" I did not know what to say. I did not feel like a rebel anymore. I wanted to confess. I told him, "I do not like science so I did not study for the exam. I want to go to Delhi to pursue graduation in Hindi. But I am sorry that you had such high hopes of me and I disappointed you."

Mummy shouted at me, "What will you do by studying Hindi? Become a poet? How much will you earn?" I had no answer. Papa asked Mummy to keep quiet. He said, "Did you taste the sweets?" My sense of guilt resurfaced. I said, "I am sorry. I could not make you proud." He smiled again. He said to Gudia, "Bring the sweets, let's have them." I was surprised, so was Gudia. Was he trying to shame me further? Why was he acting so cool?

Sweets were brought and Papa asked all of us to have some. I couldn't. No one could. Then he told me a story. He said, "In our village, there was a very heavy wrestler by the name of Bhoomi Sanghai. He was so huge and powerful that no one could defeat him. Every year during the Kartik Mela, he used to organize Akhadas where he used to invite youngsters to fight him and he would give the winner a big laddoo. No one ever dared to challenge him and no one got that laddoo. Once a young boy challenged him and Bhoomi Sanghai fought him in the Akhada. They guy was no match for Bhoomi and after some struggle he was defeated by easily. Everyone laughed at the poor chap. Bhoomi Sanghai called for the laddoo and gave one to the young boy. the boy asked why was he getting the laddoo when he had actually lost. Bhoomi Sanghai said to him,"Whether you win or you lose, you shall get one laddoo. The laddoo is not for winning, it is for the fighting. You showed courage to fight me, so you earn a laddoo." As you have also shown the courage to appear in this exam, you deserve a sweet, even if you have failed. And you say that you failed because you didn't study. So if you study, you can clear it next time. And if you really do not want to do this, you can go to Delhi and do what you like."

I was silent. My rebellion was withering away. I still hated science. I still wanted to go to Delhi and study Hindi. But I just couldn't do that. I wanted to show Papa that I could clear JEE and that I had no idea that this meant so much to everybody. Had he scolded me and fought me, I would have run away to Delhi the next day. But I decided to stay back and give the exam one more try for the next year. Now, there was nothing else in my life for the next one year. I just wanted to clear the JEE as an apology to my father for cheating on him. I had not earned my laddoo yet. I had really not fought enough. 

Sunday, July 7, 2013

Greener on the Other Side

During the final years of college, getting a job seemed as the most important thing in life. I had a pretty average CPI and my knowledge of Mechanical Engineering was practically zero. But I had 'extra-curriculars' and so I thought that I shall be able to get a good job. In those days, in 2006, a 25k per month salary looked amazing. A package of 6 lakhs per annum was the average those days and lucky guys cracked 8 lakhs p.a. I had done my Summer Internship in Schlumberger and hence that was a backup option. But the job at Schlums appeared to be for the sporty and the adventure loving and I wanted a job more social.

I opted for everything other than Mech Engg and got through Sales and Marketing in HUL. Later I found out that I was hired at the same position that IIM grads are hired. The package was 8 lakhs CTC. I was the happiest man in the campus. I thought that I have made it in life. I had moved from engineering to marketing and I was going to be treated at par with IIM grads. During the training the company also got us a certificate from IIM Bangalore. The package increased to 15 lakhs in less than three years. And I was managing a Sales turnover of about 7-8 crores per month for HUL. 

Friends and colleagues around me were buying houses in Gurgaon and Noida, owning cars like Swift and I10 and aspired to buy Honda City and Toyota Corolla. I somehow did neither. The near lakh per month salary made no sense to me anymore. My dreams were always of a 30k salary and so I didn't know what to do with the rest. I spent most of my disposable income in eating and drinking at random five start hotels and living a life of no future planning. I saw friends from college struggling to get to the civil services and I thought that I am wasting my time making money. I should do something of a greater purpose. I thought I don't need a Honda City or a Duplex in Gurgaon to make me happy. I wanted a job with much higher values and purpose.

After two years of struggle, I came to the IAS. By the time I entered IAS, salaries at HUL and similar companies had crossed 25 lakhs per annum. And the salaries at IAS started at around 30k per month. I had already spent 6 years after college figuring out my desired career. Now when I am here, my friends have moved on to doing an MBA abroad or even if they have stayed in their jobs, they have bought bigger cars, they have bought houses worth 50-80 lakhs and dine in the costliest restaurants. I could have been in their places had I stayed on, but then it seemed pointless to acquire all those assets then. Now, they suddenly look lucrative.

Now that my salary is around 30k, which too hasn't arrived for the last month, due to paper work drama at the government (in fact, it might not come for the next two months, as that much time is taken by govt to complete paper work on first posting), 'things which I didn't care to acquire' have transformed into 'things that I can't acquire'. It is a different story that subsidized house and vehicle shall be arranged at almost all places of postings, but if I want to have my own house and my own vehicle, I shall be way short of finances. I am yet to see the real work on ground and probably that may be the silver lining in this job - the intrinsic job content. But as of today I feel a confused middle class lad who always found the grass greener on the other side.

Sunday, May 12, 2013

maa, mujhe vaapas bula le

माँ, मुझे वापस बुला ले

जीवन की उलझन में डूबा
जीवन खोज रहा हूँ
बीच समन्दर निपट अकेला
गॊते लगा रहा हूँ

फिर से साहिल की मिट्टी का
मुझको तिलक लगा दे
माँ, मुझे वापस बुला ले

बचपन की अठखेलियाँ अब भी
मरी नहीं इस मन से
भीतर अब भी बच्चा ही हूँ
युवा हुआ बस तन  से

यौवन के इस तप्त डगर पर
अपना आँचल लहरा दे
माँ, मुझे वापस बुला ले

नही करूँगा कोई शरारत
बात सभी मानूँगा
तुझे तंग करने की
अब मैं कभी नहीं ठानूंगा

फिर से बना ले बच्चा मुझको
गोद में अपनी सुला ले

माँ, मुझे वापस बुला ले

Friday, April 19, 2013

love thy lady


In a society like ours, being a man is more difficult than just having a male body. If you cannot taunt on a woman's body, you aren't man enough. If you can't embarass a woman for her sexuality then your own sexuality shall be questioned. If you can't make fun of a gay friend, then you must be a gay yourself and hence you should be made fun of. If you are managing your career in order to accomodate your wife's career, you are weak and if you get your wife to quit her career so that she can cook for you and rear kids for you, you are a man. if you do well in life and are 'eligible' for a heavy dowry but decide to marry to a woman you love, outside your caste and without any dowry, you are a fool who has been trapped by a girl. 

Every one will teach you in school that you should treat women with respect and that woman is a 'devi' and we worship her. They'll teach you that she is a mother, a sister, a wife and a daughter and hence love her. But just no one bothers to say that love her just because she is just another person. If you are to be referred to as just you, why should she be referred as someone's mom, or sister or wife. She is what she is. Why is it so difficult for you to accept that.

You must have been a great success in life, but so can she be. Intellect is not a function of sex and neither is stupidity or morality. Just because you have a very good career, you will tell your wife to stay at home as she doesn't need to work anymore. Why the hell do you need to work then, if she has a good job? If you are in a job that means a lot of transfers, why should she quit working and move with you? Why can't she continue her career and you manage accordingly? Oh sure, because you are a man, and she is not. You are the breadwinner, despite the fact that she can not only earn the bread better than you can but also can make that bread and feed it to your kids. At all of these you are worse off than her. But never mind, you are a man. You are supposed to feel superior though you know that you are far weaker than her.

If you get drunk, it is okay as you are a guy, but if she drinks, it is not good, bcause our 'national tradition' does not prefer women drinking. If you eye other women, just because you can never get over a woman's body, it is normal, but if she dresses up in manner to catch a man's attention, she should be corrected. You can fanatsize about a woman whether she is a teacher dressed well or a housemaid dressed poorly, but if your girlfriend dresses in a manner that appears revealing to you, you surely will feel humiliated and insecure. Because no one knows the other men better than you. You just can't accept the fact that all other men will look at your girl in the manner you look at other girls. And since you are feeble and weak to stop other males, you would try all tricks to control your lady.

Why does it take you so much effort to see that she is just a person, very much like you. She can have a different body, a different physiology and a different psychology, but why don't you just let it be. She also has the freedom to get drunk and make her career the way she wants it to be. She has the right to dress in the manner she wishes because she is doing it for herself and for you. And if she does want to attract other men fight the other men, if you will, let her be what she is. Love your lady for what she is and stop giving a damn to what the world tells you. 

Friday, January 4, 2013

NADT - 'N'ot only 'A'bout 'D'irect 'T'axes

December 2011. I landed at Nagpur to a very royal welcome at the National Academy of Direct Taxes. Contrary to my welcome at college way back in 2002 when it was all about 'kholo', 'ragging' and 'bakaiti', here it was with a rose bud, a gift hamper and smiles from the senior batch. We, the 65th Batch of the Indian Revenue Services (Income Tax) seemed to have arrived.

Soon, we were to get into a frenzy of wardrobe management. First of all there was that black Bandgala and as the name suggests, it chokes your throat badly, more so if you are endowed with a double chin like mine. Then there was the formal/lounge suit which by the way could not be called so, as there was no lounge in the academy. So to make sure that lounge suits are not left without a use, the classrooms were the places that were to be entered in a lounge suit. Ha! This was amazing. In college, we were lamented for wearing shorts, t-shirts (with Black Sabbath or Pink Floyd on it) and bathroom chappals into classes and here I was going to class in a lounge suit. Then there was the academy track suit along with a set of white shorts and white t-shirts to be worn for Morning Activity. The name is misleading. Morning Activity sounds so benign as if we would wake up to do some saheb-type stroll in a lawn with a pet dog accompanying us. However, it should be renamed as 'extremely physical activity that is the birthplace of all Memos'. (More about what and who is that animal called Memo after a couple of paragraphs). There were also days when we were supposed to wear traditional Indian dresses like the kurta pyjama and the like.

Having stuffed our wardrobe with enough number of shirts and ties and suits, we went to our first class after the inauguration lecture. We were introduced to characters called the DG, ADG-1, ADG-2 and also the CD, ACD-1, ACD-2. We also came to know that we are called the OT. I wondered why there weren't any AOT-1 and AOT-2!!. Never Mind. The "Oh-Tea" was more than just a name. It signified two of the most used terms in our lives. At each lecture, we would exhale "Oh", either at the sheer sleepiness of them or at the immense amount of hyper-divine taxation knowledge that moved past us like dangerous missiles. And at the end of each lecture, we would crave for Tea. I was soon to learn that Tea forms the most integral and basic ingredient in a Civil Servants life.

Alas, I do not take tea. But that didn't matter. Because in government, the Tea is never about the tea. It is about what accompanies the tea. It is either a cookie, a biscuit, a pastry, a pakoda or any other innovation. In fact, when bigger officials or guests arrive, there is always a High-Tea that is organized. While the name might mislead people to expecting liquor or grass, it actually means that the tea will be accompanied by so many snacks that you can actually get high on cholesterol. For someone like me, I just waited for days when a High Tea would be organized.

By the way, what were be being trained at? Oh, we were being trained to collect income tax. Simple isn't it? Ha! Not even close. The Income Tax Act which is one of the zillion Acts that India has takes pride in boasting that it is the most complex act and looks bulkier than even the Constitution of India. The Income Tax Rules, however beats even the Act in its bulkiness. First I thought that these were given to be used during the Morning Activity where these shall be used as dumb-bells to flex some muscles. To my horror, I realized these were to be read. Reading the IT Act is not, truly speaking, reading. It is actually Textual Harassment. My feelings on the legal language of the Act has already been expressed here http://cmt-lekhnise.blogspot.in/2012/01/legal-bullshit.html

But the most MEMOrable part of the training is the MEMO. It is that small piece of paper which lands at you like a bomb, if you are found missing from the Morning PT or in any class or even in any cultural function. Then you submit a reply and then get a moral lecture from the faculty and then forget about it. That reminds me of the Cultural functions. Oh there were too many of them and the most scary part was that our CD himself was an accomplished artist. A flute player of repute. That only meant that all cultural programmes had to be of the level to match his and that left many of us trying hard to come up with a show that he would approve of. I saw many innocent OT's burning midnight oil with a dance or a song and waiting in anticipation at the auditions of cultural programmes conducted by the CD himself. Poor souls.

However, NADT remains in my memories my baptism centre in the government and a place where I spent my enjoyable time. As luck would have it, I moved out from the academy to join another service but I still am fond of my NADT day's introduction - "Hello, I am CMT, an OT in IRS(IT), who lives at NADT and loves High Tea"