Monday, November 17, 2008

ख़ुद से मिलूँ....


कदम रुक जाते हैं देहलीज़ पे जाकर अक्सर
जिस्म डर जाता है सोच के अगला मंज़र

न जाने कौन सी तस्वीर नज़र आएगी
जाने कैसी आवाज़ सुनाई देगी अन्दर
होगा क्या देखने में इन्सां - सा
या खुदा की तरह बेशक्ल सी हस्ती होगी

बरसों से इक लफ्ज़ भी बोला ही नहीं
न कभी राह से गुज़रा मेरे
कभी दिख जाता था आईने में
अब तो सालों से नहीं आया नज़र

मैं भी मसरूफ रहा दुनिया में
करता रह इंतेज़ाम रोज़ी का
कभी माँ - बाप ने उलझा के रखा
कभी औलाद ने छीन लिया वक्त मेरा

जो भी लम्हा बचा लिया जो कभी
तो काम पकड़ा दिए बीवी ने
उनसे निबटा तो जकडा रोगों ने
ढलते सूरज की तरह मैं भी ढलने लगा

अब फुर्सत है मुझे...

माँ - बाप को तो गुज़रे हो गए बरसों
पिछले बरस बीवी ने भी छोड़ दिया
मौत उसकी मुझे कर गई तन्हा
बेटे ने तो कब से छोड़ रखा है घर

ऐसे में याद आ गई उसकी
जिसकी देहलीज़ नहीं लांघी थी जाने कब से
आज उठ गया कदम उस तरफ़ तो सोचा है
क्यूँ न आज ख़ुद से मिल आऊँ जाकर .....

(Written on Nov 17, 2008)

1 comment:

Rahul said...

Nice work cmt!
poem padh ke lag ta hai jaise ek bujurg jisne sab kuch jii liya ho, woh apni kahani bata raha ho, apne har beete hue pal ko kuch lafzon me samet raha ho, aur ..

Jai Shri Ram !